Hindi Poem For Kids [बच्चों के लिए हिंदी कविताएँ] Hindi Mein Poem

बच्चों के लिए हिंदी कविता (Hindi Poem for Kids) और हिंदी कविता के लिरिक्स (Hindi Poem Lyrics) आज की पोस्ट में दिए गए। नर्सरी से पांचवी कक्षा (Class Nursery, 1,2,3,4 and 5)  तक के सभी बच्चों के लिए आज की पोस्ट में हिंदी में कविताएँ (Hindi me Poem) दी गयी है। ये कविताएँ पढ़ने और लिखने में आसान होने के साथ-साथ काफी ज्ञानवर्धक भी है। उम्मीद करते हैं आपको नीचे दी गयी हिंदी कविताएँ (Hindi Poems) जरूर पसंद आएगी।

Poem Hindi Mein (For Kids) – हिंदी में कवितायें 

1. अच्छे बच्चे

हम बच्चे अच्छे स्कूल के,
पक्के अपने हैं असूल के।
 
हिल-मिलकर सब संग में पढ़ते हैं,
दूरी रखते क्रूर से।
 
कदम बढ़ाकर पथ पे चलेंगे,
बुरे कर्म से सदा डरेंगे।
विजय पताका हम गाड़ेंगे,
लोग देखेंगे दूर से।
 
कटु वचन न हम बोलेंगे,
सच की तराजू पर तौलेंगे।
थाल सजा के करेंगे पूजा,
जलेंगे दीप कपूर के।

2. देश हमारा सपना है

सबसे सुंदर, सबसे प्यारा
देश हमारा सपना है,
सोना बरसाते सूरज-सा
इसको उज्ज्वल रखना है।
गली-गली में गूँजा करते
हैं मेहनत के गीत यहाँ,
खूशबू फैली अमन-चमन में
खुशबू का संगीत यहाँ।
हिल-मिल रहते हम-तुम, तुम-हम
नहीं यहाँ है दीवारें,
आसमान को छू ही लेंगी
इसके गौरव की मीनारें।
कल का भारत जगमग होगा
कल का भारत सोने-सा,
सपना है गेंदे-गुलाब-सी
मन की माल पिरोने का।
उजला-उजला, सबसे उजला
देश हमारा सपना है,
चम-चम चंदा की चाँदी-सा
इसको उज्ज्वल रखना है!

3. डाकी बंदर

हूऽप हूऽप कर
कूद रहा था
डाकी बंदर
उछल-उछलकर …1  
 
इस डाली से
उस डाली पर
और बंदरिया
अपने बच्चे
को चिपकाकर
एक ओर
बैठी थी डरकर …2
 
चीं चीं करता
छोटा बच्चा
बहुत डरा था
शोर सुना जब
पक्षी उड़कर
चले गए थे
पंख हिलाते
दूर झाड़ पर …3
 
बंदर फेंक
रहा था पत्ते
तोड़-तोड़कर
नीचे भू पर
सिहर रहा था
आम बिचारा
अपने बोरों
के झड़ने पर …4
 
विद्यालय जब
छूट गया तो
बच्चे दौड़े
अपने घर पर
हूऽप हूऽप सब
करते जाते
बंदर बनकर
वहां सड़क पर …5 
 
हूऽप हूऽप कर
कूद रहा था
डाकी बंदर
उछल-उछलकर …6 

4. चूहा और ऐनक

घूम रहा था चूहा घर में
टेबल के ऊपर वह आया
वहां पड़ा था सुंदर ऐनक
जो था उसे बहुत ही भाया …
 
ऐनक लेकर कान चढ़ाया
और सामने दर्पण पाया
देखा उसने एक बड़ा सा
चूहा उसके सम्मुख आया …
 
आंख तरेरी उसने उस पर
वही रूप उस पर भी छाया
लपका उस पर जब यह चूहा
दर्पण से जाकर टकराया …
 
बार-बार टकराए दोनों
कोई उनमें जीत न पाया
चूहा लगा बैठ सुस्ताने
वैसा ही दूजा सुस्ताया …
 
शिथिल हुआ जब पहला चूहा
मुड़ा और बिल घुसने धाया
उसे देखकर दूजे ने भी
उसी दिशा में कदम बढ़ाया …

Hindi Poems for Class 2 Competition

5. लाला जी की तोंद

लाला जी की प्यारी तोंद,
ढाई मन यह भारी तोंद!
इसमें, पिस्ता-दूध-मलाई
खोया, बरफी, बालूशाही,
आम, पपीते और अंगूर
मन भर लड्डू मोतीचूर।
खाते-खाते थक्कर भाई,
हिम्मत कभी न हारी तोंद!
मालिश इस पर करते लाला,
तेल पिलाकर इसको पाला,
आगे गोल, पीछे गोल-
तोंद बनी लाला की पोल।
पीछे-पीछे लाला चलते-
आगे सजी-सँवारी तोंद!
हर दिन कपड़े छोटे होते
लाला जी तब बरबस रोते,
भीड़-भाड़ में चलते डरकर
हाथ लगा, जा गिरे सड़क पर।
सचमुच, आफत हो जाती यदि-
होती कभी हमारी तोंद!

6  . तोता और केरी

तोता केरी खाता है
कुतर-कुतर रह जाता है
टें टें करता सदा-सदा
बच्चों को वह भाता है …
 
नहीं अकेला आता है
मित्र साथ में लाता है
छुग्गन पर जब बैठा होता
सागी केरी पाता है …
 
झूम झूम लहराता है
खाते वह इठलाता है
छोड़ अधूरी केरी को
निकट दूसरी जाता है …
 
ना वह गाने गाता है
आम वृक्ष से नाता है
काट कभी केरी डंठल को
वह दाता बन जाता है …

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7. पापा कैसी कार मंगाई?

पापा कैसी कार मंगाई।
आठ लाख में घर आ पाई।   
 
मुझको तो गाड़ी यह पापा, 
बहुत-बहुत छोटी लगती है। 
अपने घर के सब लोगों के, 
लायक नहीं मुझे दिखती है।
 
फिर भी जश्न मना जोरों से, 
घर-घर बांटी गई मिठाई। 
 
कार मंगाना ही थी पापा, 
तो थोड़ी-सी बड़ी मंगाते। 
तुम, मम्मी, हम दोनों बच्चे, 
दादा-दादी भी बैठ जाते।
 
सोच तुम्हारी क्या है पापा
मुझको नहीं समझ में आई। 
 
मां बैठेगी, तुम बैठोगे, 
मैं भैया संग बन जाऊंगी। 
पर दादाजी-दादीजी को, 
बोलो कहां बिठा पाऊंगी।
 
उनके बिना गए बाहर तो
क्या न होगी जगत हंसाई?
 
मम्मी-पापा उनके बच्चे, 
क्या ये ही परिवार कहाते
दादा-दादी, चाचा-चाची, 
क्यों उसमें अब नहीं समाते!
 
परिवारों की नई परिभाषा, 
मुझको तो लगती दुखदाई।। 

8. उधम की रेल

क्यों करते हो बाबा उधम, 
नहीं बैठते हो चुपचाप। 
 
अपने कमरे में दादाजी, 
पेपर पढ़ते होकर मौन। 
दादीजी चिल्लातीं चुप रह, 
जब बेमतलब बजता फोन।
 
शोर-शराबा, हल्ला-गुल्ला, 
उनको लगता है अभिशाप। 
 
उछलकूद या चिल्ल-चिल्लपो, 
पापा को भी लगे हराम। 
गुस्से के मारे कर देते, 
चपत लगाने तक का काम।
 
भले बाद में बहुत देर तक। 
करते रहते पश्चाताप। 
 
पर मम्मी कहतीं हो-हल्ला, 
ही तो है बच्चों का खेल। 
उन्हें भली लगती जब चलती, 
छुक-छुक-छुक उधम की रेल।
 
उन्हें बहुत भाते बच्चों के, 
धूम-धड़ाकों के आलाप। 

Child Poems in Hindi (बच्चों के लिए हिंदी कविता)

9. एक थे बंबू खाँ

एक थे भैया बंबू खाँ
बंबू खाँ भई, बंबू खाँ,
ऊँचे-ऊँचे बंबू खाँ,
लंबे तगड़े बंबू खाँ।
थे वे पूरे तंबू खाँ,
सचमुच ऐसे बंबू खाँ!
हाथी जैसे पैरों वाले
आँधी थे वे बंबू खाँ,
जब चाहे तो हाथ बढ़ाकर
नभ छू लेते बंबू खाँ।
खंभे जैसी टाँगें भैया
टीले जैसे उनके हाथ,
नहीं कोई था उनके जैसा
नहीं कोई चल पाया साथ।
बिफर-बिफर पड़ते थे बंबू,
चलते थे तो ऐसा लगता
चला आ रहा जैसे तंबू।
एक दिन बड़ी अकड़ में धम-धम
बंबू खाँ चलते जाते थे,
भागे हाथी, शेर, बघर्रा
ये सब उनसे थर्राते थे।
तभी कहीं से आई भैया
छोटी एक चंचल मक्खी
तुरत नाम में घुसी कि बंबू
छींक उठे, भई-आक्छी, आक्छी!
छींकें-छींके, इतनी छींके
खुद ही उड़ गए बंबू खाँ,
दूर कहीं जंगल में जाकर
गिरे बिचारे तँबू खाँ।
तंबू खाँ की तब तो भैया
ऐसी मिट्टी हुई पलीत,
बोले सारे-अकडू हारे
है नन्ही मक्खी की जीत!
दूर कहीं पर बैठी मक्खी
सुन-सुनकर यह मुसकाती थी,
बंबू ‘आह-आह’ चिल्लाते
हँसी होंठ पर तब आती थी।
फिर धीरे से उड़कर मक्खी
जाने भाई, गई कहाँ,
पर बंबू खाँ जहाँ गिरे थे
टूट-फूटकर पड़े वहाँ!

10. एक मटर का दाना

एक मटर का दाना था जी
एक मटर का दाना,
गोल-गोल था, सुंदर-सुंदर
था वह बड़ा सयाना!
घर से निकला, चौराहे पर
मिली उसे एक कार,
उछला-कूदा, कूदा-उछला
झटपट हुआ सवार
बैठ कार में, खूब अकड़कर
दौड़ा – दौड़ा – दौड़ा,
गलियाँ, सड़कें, चौरस्ते
सबको ही पीछे छोड़ा।
आगे-आगे, दौड़ा आगे
एक मटर का दाना!
एक मटर का दाना, था जो-
सचमुच बड़ा सयाना!
दिल्ली देखी, जयपुर देखा
कलकत्ते हो आया,
सभी अजूबे देख-देखकर
झटपट घर पर आया।
आ करके, नन्हे चुनमुन को
किस्सा वही सुनाया,
खूब हँसा वह, औरों को भी
खिल-खिल खूब हँसाया।
देखो, एक घुमक्कड़ समझो
मुझको जाना-माना,
इब्न बतूता संग घूमा हूँ
किस्सा बड़ा पुराना!
अजी मटर का दाना था वह
एक मटर का दाना!
एक मटर का दाना था
वह सचमुच बड़ा सयाना।

11. खेलकूद की आजादी

हमें चाहिए, अजी चाहिए-
खेल-कूद की आजादी!
बोर करो मत पापा जी अब
हमको टोको ना,
क्रिकेट खेलेंगे दिन भर अब
हमको रोको ना।
खेल नहीं तो जीवन भी है
फीका-कितना फीका,
बिना खेल के अजी जायका
बिगड़ा है अब जी का!
बहुत सहा है, नहीं सहेंगे
अब हम कोई बंधन,
खेल नहीं तो पढ़ने में भी
कहाँ लगेगा मन!
खेल-कूद से ही आती है
हिम्मत कुछ करने की,
मुझे बताया करती थी यह
हँस-हँस प्यारी दादी।
इसीलिए तो हमें चाहिए,
खेल-कूद की आजादी!
खेल नहीं बेकार, इसे अब
दुनिया मान रही है,
जोश नहीं यह झूठा-मूठा
दुनिया जान रही है।
फिर पैरों में ये जंजीरें
क्यों कोई पहनाए,
राह हमारी बिना बात ही
रोके या भटकाए।
ज्यादा रोको ना, टोको ना
हमको अब पापा जी,
बच्चों को देनी ही होगी
खेल-कूद की आजादी।
वरना अब सत्याग्रह होगा
होंगी हड़तालें भी,
पैदा होगा हममें से ही
कोई नन्हा गाँधी!
नारा यही लगाएगा जो
आजादी! आजादी!
हमें चाहिए, अजी चाहिए,
खेल-कूद की आजादी!

12. चिट्ठी का संदेश

चिट्ठी में है मन का प्यार,
चिट्ठी है घर का अखबार!
इसमें सुख-दुख की है बातें
प्यार भरी इसमें सौगातें,
कितने दिन कितनी ही रातें-
तय कर आई मीलों पार!
यह आई मम्मी की चिट्ठी
लिखा उन्होंने-प्यारी किट्टी,
मेहनत से तुम पढ़ना बेटी,
पढ़-लिखकर होगी होशियार।
पापा पोस्टकार्ड लिखते हैं
घने-घने अक्षर दिखते हैं,
जब आता है बड़ा लिफाफा-
समझो, चाचा का उपहार!
छोटा-सा कागज बिन पैर
करता दुनिया भर की सैर,
नए-नए संदेश सुनाकर
जोड़ रहा है दिल के तार!

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