Nari Shiksha Par Nibandh with Headings | नारी शिक्षा पर निबंध

Essay on Women Education in Hindi (स्त्री-शिक्षा पर निबंध)

नारी शिक्षा पर निबंध

1. प्राचीन भारत में स्त्री-  शिक्षा-प्राचीन भारत में सामान्य रूप से सभी स्त्रियों को पुरुषों के समान शिक्षा प्राप्त करने की सुविधाएँ प्राप्त न थीं। प्राचीनकाल में विश्वतारा, घोष, लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी आदि कतिपय विदुषी नारियों का उल्लेख प्राप्त होता है। बौद्धकाल में अवश्य ही स्त्रियों की शिक्षा (Nari Shiksha) के लिए पृथक् संघ थे।

मुस्लिम-काल में पर्दा-प्रथा के कारण धनी परिवारों की बालिकाएँ व्यक्तिगत रूप से शिक्षा प्राप्त करती थीं। कुछ मुस्लिम बालिकाएँ मकतबों में शिक्षा ग्रहण करती थीं। इस काल में शिक्षा का काफी ह्रास हुआ, फिर भी रजिया बेगम, नूरजहाँ, जहाँआरा, जेबुन्निसा, मुक्ताबाई, जीजाबाई, गुलबदन मुमताज महल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

ईस्ट इंडिया कंपनी के समय नारी-शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। मिशनरियों ने बालिका-शिक्षा के लिए कुछ विद्यालय स्थापित किए। सन् 1819 में डेविड हेयर ने बालिका-समाज नामक संस्था की स्थापना की। सन् 1854 में बुड के घोषणा पत्र में स्त्री-शिक्षा (Nari Shiksha) का भार शासन ने स्वयं ले लिया। 1882 तक प्रत्येक स्तर पर बालिकाओं की शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएँ हो गईं। सन् 1904 में श्रीमती एनी बेसेंट ने वाराणसी में केंद्रीय हिंदू बालिका विद्यालय’ की स्थापना की।

महात्मा गांधी द्वारा संचालित राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्रियों ने अपना अपूर्व योग दिया। परिणामस्वरूप सन 1927 में अखिल भारतीय स्त्रिी-शिक्षा (Nari Shiksha) सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें महिलाओं ने पुरुषों के समान अधिकारों की माँग की।

स्वतंत्रता-प्राप्ति पर भारतीय संविधान में घोषित किया गया कि धर्म, जाति, संप्रदाय, लिंग आदि के आधार पर राज्य के किसी भी नागरिक में भेद नहीं किया जाएगा। अतः स्त्री-शिक्षा के प्रसार के लिए विभिन्न समितियों का गठन हुआ।

2. राष्ट्रीय महिला शिक्षा समिति-  1954 में दुर्गाबाई देशमुख की अध्यक्षता में राष्ट्रीय महिला शिक्षा समिति गठित हुई, जिसने निम्न सुझाव दिए-

  1. केंद्रीय सरकार को कुछ दिनों के लिए स्त्री-शिक्षा को विशिष्ट समस्या समझकर इसका प्रसार करना चाहिए।
  2. सरकार को निश्चित योजना बनाकर इसका प्रसार करना चाहिए।
  3. स्त्री और पुरुष की शिक्षा में विभिन्नता को समाप्त करना चाहिए।
  4. ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्री-शिक्षा का प्रसार किया जाना चाहिए।
  5. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा इस पर विचार किया जाना चाहिए।
  6. बालिका तथा स्त्री-शिक्षा की परिषदों का निर्माण किया जाना चाहिए।

3. राष्ट्रीय महिला-शिक्षा-परिषद् (1959) -परिषद् ने प्रौढ़-शिक्षा और स्त्री-शिक्षा (Nari Shiksha) के पक्ष में जनमत का निर्माण करने एवं स्त्री-शिक्षा की प्रगति के लिए भावी कार्यक्रमों को बनाने का सुझाव दिया।

4. हंसा मेहता कमेटी (1962) -कमेटी के समक्ष मुख्य प्रश्न था कि ‘ क्या विद्यालय-स्तर पर बालक-बालिकाओं की शिक्षा में अंतर होना चाहिए? इस सम्बंध में समिति ने अपने कुछ सुझाव प्रस्तुत किए-

  1. भारत में जनतंत्रीय समाज की स्थापना है, अत: ऐसे समाज में लिंग के आधार पर पाठ्यक्रमों में अंतर करने की आवश्यकता नहीं।
  2. ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, जो पुरुषों एवं स्त्रियों के वर्तमान अंतर को स्थाई या अधिक उग्र बना दे।

शिक्षा-आयोग के प्रतिवेदन (1964-66) में मुख्य रूप से यह विचार प्रकट किया गया कि ‘ स्त्रियों और पुरुषों की शिक्षा के बीच की दूरी को यथासंभव समाप्त किया जाए। इसके लिए योजना व पर्याप्त धन की आवश्यकता होगी। केंद्र और राज्यों में लड़कियों और स्त्रियों की शिक्षा की देखभाल के लिए एक विशेष संगठन बनाया जाए। आवश्यक होगा कि स्त्रियों के प्रशिक्षण और उनकी रोजगार की समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया जाए तथा उन्हें घर की व्यवस्था करने एवं जीवनोपयोगी सेवा-कार्य के योग्य बनाया जाए। अध्यापन, नर्सिंग एवं समाज-सेवा जैसे स्वीकृत क्षेत्र में स्त्रियों को महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।

अब हमारे सामने यह प्रश्न उठता है कि क्या स्त्री-शिक्षा (Nari Shiksha) भारत जैसे महान राष्ट्र के लिए आवश्यक है अथवा नहीं? इस विषय में विभिन्न विद्वानों के भिन्न मत हैं किंतु सभी विद्वान अंत में इस बात पर सहमत हैं कि देश एवं समाज की प्रगति के लिए स्त्री-शिक्षा अनिवार्य है।

5. स्त्री-शिक्षा (Nari Shiksha) के पक्ष में प्रस्तुत तर्क-नारी ही अपने सत्कर्त्तव्यों से देश एवं राष्ट्र का कल्याण करती है। वह वीर-प्रसवा जननी के रूप में देश के वीर पुत्रों को जन्म देती है, जो देश की रक्षा कर उसका मस्तक ऊँचा करते हैं। वह शक्ति माता के रूप में ऐसी ज्ञानमयी संतान उत्पन्न करती है, जो उस अगोचर और अगम्य ब्रह्म का साक्षात्कार करते हुए इस भवसागर में डूबे हुए असंख्य प्राणियों का अपने ज्ञान और भक्ति के उपदेशों से उद्धार कर देते हैं। विदुषी माता उन मेधावी पुत्रों को जन्म देती है, जो अपनी अकाट्य विद्वत्ता के समक्ष दूसरों को खड़ा नहीं होने देते। बच्चे के लिए शिक्षा, सभ्यता, अनुशासन, शिष्टता आदि सभी विषयों की प्राथमिक पाठशाला घर ही है, जिसकी प्रधानाचार्या माता है, वह अपने बालक को जैसा चाहे बना सकती है।

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भारत में जितने भी महापुरुष हैं, इतिहास साक्षी है कि उनके जीवन पर उनकी माताओं के उज्ज्वल चरित्र की स्पष्ट छाप अंकित है। सत्यभाषिणी, धर्मप्राण पुतलीबाई के शुभ संस्कार उनके पुत्र मोहनदास गांधी पर बचपन से ही दिखाई देने लगे थे। भविष्य में वह बालक सत्य और अहिंसा का अनन्य उपासक हुआ, जिसे आज भी समस्त विश्व मानवता का अमर पुजारी कहकर श्रद्धा से नतमस्तक होता है। छत्रपति शिवाजी को देशभक्त के रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय उनकी माता जीजाबाई को ही था।

इसी प्रकार गृहस्थी रूपी गाड़ी को चलाने के लिए भी स्त्री-शिक्षा की परम आवश्यकता है। शिक्षा के द्वारा नारी को कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का ज्ञान होता है, गुण और अवगुणों की पहचान होती है, जीवन का वास्तविक मूल्य समझ में आता है, मस्तिष्क की ग्रंथियाँ खुल जाती हैं। शास्त्रों में गृहिणी के कई रूप बताए गए हैं। वह विपत्ति के समय सत्परामर्श से मित्र का कर्त्तव्य पालन करती है, माता के समान स्वार्थरहित साधन और सेवा में तल्लीन रहती है और पत्नी के रूप में अपने पति को पूर्ण सुख प्रदान करती है। गुरु की भाँति बुरे मार्ग पर चलने से अपने पति एवं बच्चों को रोकती है। इतने महान् कर्त्तव्यों को निभानेवाली माता के अशिक्षित होने पर संपूर्ण प्रगति ही रुक जाएगी। स्पष्ट है कि स्त्री-शिक्षा (Nari Shiksha) के सम्बंध में कोई प्रश्न-चिह्न नहीं लगाया जा सकता है। इसकी प्रगति के लिए शीघ्रातिशीघ्र प्रयास किए जाने चाहिए।

6. शिक्षा के लिए प्रस्तुत तर्क-भारत के कितने ही रूढ़िवादी व्यक्ति अज्ञानता, पर्दाप्रथा तथा बाल-विवाह के वशीभूत होकर बालिकाओं का क्षेत्र घर की चारदीवारी तक ही सीमित कर देते हैं। हमारे धर्म-शास्त्रों में कहा गया है कि दशवें वर्ष में पहुँचते ही लड़की का विवाह कर देना चाहिए

प्राप्ते तु दसम वर्षे, यस्तु कन्या न यच्छसि।
मासे-मासे रजस्तस्याः पिता पिवति शोणितम्॥

वे कहते हैं कि लड़कियों को शिक्षा देने पर वे परिवार के कर्त्तव्यों को भूल जाती हैं तथा शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य धनोपार्जन समझकर अपने घरेलू कत्तव्यों से विमुख होकर नौकरी की तलाश में घूमती हैं, जिसके कारण बेरोजगारी की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। शिक्षा प्राप्त करने पर उनका बौद्धिक विकास होता है, अतः वे पुरुष के साथ अपना समायोजन कठिनता से कर पाती हैं।

इसका यह अर्थ नहीं है कि उपर्युक्त अवगुणों या दोषों के कारण स्त्री-शिक्षा की अवहेलना की जाए, वरन् इससे अच्छा यह है कि वर्तमान शिक्षा-पद्धति में सुधार किए जाएँ, क्योंकि स्त्रियों की वर्तमान शिक्षा उस जीवन के लिए पूर्णतया निरर्थक है, जो उनको व्यतीत करना होता है। भारत में बालिकाओं को दी जाने वाली शिक्षा बालकों की शिक्षा की अनुकृति मात्र है।

अंततोगत्वा यह कहना उचित ही है कि स्त्री-शिक्षा-सम्बंधी प्रत्येक उत्तरदायित्व शासन को लेना चाहिए और भारत में स्त्री-शिक्षा के प्रति बढी हई हेय भावना का परिष्कार करना चाहिए। यदि इस कार्य में विलंब किया गया तो स्त्री-शिक्षा (Nari Shiksha) की स्थिति अतिशोचनीय हो जाएगी।

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