Importance of Newspaper in Hindi | समाचार-पत्र निबंध

Essay on Importance of Newspaper – (समाचार-पत्र तथा उनकी उपयोगिता)

समाचार-पत्रों के लाभ तथा हानियां

भूमिका- कौतूहल और जिज्ञासा दो ऐसी वृत्तियां हैं जिनसे प्रेरित होकर मनुष्य संसार की नित नवीम घटने वाली घटनाओं से परिचित होना चाहता है। मनुष्य आज केवल अपने देश के विषय में ही नहीं, बल्कि सारे विश्व की घटनाओं के विषय में जानकारी प्राप्त करना चाहता है। व्यापारी व्यापार के नए-नए भावों को, समाजशास्त्री समाज की नई व्यवस्थाओं को, साहित्यकार आज के युग की नई रचनाओं तथा रचनाकारों को तथा सभी प्रकार के मनुष्य राजनीति में होने वाले रोजाना के उत्थान-पतन को जानना चाहते हैं।

आज विश्व में कोई भी ऐसा देश नहीं है जहां राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक नीति में फेरबदल ना हो रहा हो। इन सब समाचारों को जानने का एकमात्र साधन समाचार पत्र हैं। समाचार-पत्र (Newspaper) शासक तथा शासित के माध्यम का काम करते हैं। समाचार पत्र ही एक ऐसा साधन है जिससे लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली पल्लवित तथा पुषित होती हुई संसार को सौरभमय बना सकती है। इनकी वाणी जनता-जनार्दन की वाणी है। ये जनता के हाथों के महान शस्त्र हैं। विभिन्न राष्ट्रों तथा जातियों के उत्थान-पतन में समाचार पत्रों का विशेष हाथ रहा है।

History of Newspaper in India -(समाचार पत्रों का इतिहास)

समाचार पत्रों का इतिहास- आज से लगभग तीन शताब्दी पहले लोगों को समाचार पत्रों का कोई ज्ञान नहीं था। केवल संदेशवाहकों के द्वारा ही समाचार एक-दूसरे तक पहुंचाए जा सकती थे। समाचार-पत्रों की उत्पत्ति (Evolution of Newspapers) सबसे पहले इटली में 13वीं शताब्दी में हुई। इसके बाद 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड में भी इनका प्रचार हुआ। 18वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने जब भारत में पर्दापण किया तो उन्होंने देखा कि देश में ऐसा कोई साधन नहीं है जिसके द्वारा अपनी बात जनता तक पहुंचाई जा सके। तब उन्होंने भारत में समाचार पत्रों का श्रीगणेश किया। ईसाई पादरियों ने भारत में भारतीय जनता तक अपने धर्म की विशेषताएं पहुंचाने के लिए ‘समाचार दर्पण’ नामक पत्र निकाला। उसका मुंह-तोड़ जवाब देने के लिए राजा राममोहन राय ने का ‘कौमुदी’ नामक पत्र निकाला। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने ‘प्रभात’ नामक समाचार पत्र का सफलतापूर्वक संपादन किया। इसके बाद देश में समाचार-पत्रों की लोकप्रियता के साथ-साथ समाचार-पत्रों के विषय भी बढ़ने लगे।

Evolution of Printing Press

मुद्रण कला का विकास- समाचार-पत्र (Newspaper)के व्यवसाय में बहुत से व्यक्तियों की आवश्यकता होती है तथा साथ ही धन की भी। इसलिए वह व्यवसाय मुख्यतः धनी लोगों के हाथों की कठपुतली बन बना हुआ है। छापने के लिए सबसे पहले मशीन, मशीनमैन कंपेजिटर, संपादक कथा संवाददाता की जरूरत होती है। समाचार-पत्रों की सफलता उसके संवादों तथा संवादों की सफलता संवाददाताओं पर निर्भर करती है। बड़े-बड़े समाचार-पत्रों के संवाददाता सारे विश्व में फैले हुए होते हैं। ये लोग आधुनिक युग के नारद हैं, किसी भी स्थान पर इनका प्रवेश कानूनी दृष्टि से वर्जित नहीं है।

टेलीफोन, तार तथा पत्रों के माध्यम से लोग विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक के समाचार अपने पत्रों के माध्यम से भेजते हैं। समाचार-पत्र का संपादकीय विभाग उनमें उचित संशोधन करके कंपेजिटरों कंप्यूटरों के पास भेजता है। इसके बाद मशीनमैन छपते हैं और फिर दूर-दूर के नगरों में रेल, हवाई जहाज, मोटर, बस आदि की सहायता से उन्हें शीघ्रातिशीघ्र भेजने का वेतन किया जाता है।

Benefits of Newspapers | Advantages of Newspapers

समाचार-पत्रों से लाभ- देशवासियों की व्यापारी उन्नति में समाचार-पत्र (Newspaper) एक बहुत बड़ा सहायक है। अपनी व्यवसायिक उन्नति के लिए व्यापारी समाचार-पत्र में अपना विज्ञापन प्रकाशित कराते हैं। अपनी बनी हुई वस्तु की विशेषता दूर-दूर तक जनता के सामने रख सकते हैं। विदेशी कंपनियां इसी माध्यम से घर बैठे लाखों रुपए कमाते हैं। पढ़े-लिखे बेरोजगार समाचार-पत्रों में अपनी रोजी-रोटी का साधन ढूंढते हैं। राजकीय तथा गैर सरकारी नौकरियों के लिए समाचार-पत्रों में एक पूरा पृष्ठ आता है।

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अविवाहित बंधु समाचार-पत्रों से ही अपने जीवन-साथी की तलाश करते हैं। वह पिता जो अपनी कन्या के लिए वर ढूंढते-ढूंढते थक जाते हैं, समाचार-पत्रों का आश्रय लेते हैं। मां से रूठ कर पुत्र, पत्नी से गिरकर पति को संगीत कुसंगति से प्रेम करके जब छोटा बच्चा घर से निकल जाता है तो तब उसको बुलाने और खोज करने के माध्यम का श्रेया समाचार-पत्रों को ही जाता है। सभी मुख्य परीक्षाओं के परिणाम भी समाचार-पत्रों में ही आते हैं। अतः समाचार-पत्र छात्रों के भाग्य निर्णायक भी है।

आज के युग में पिछड़ी हुई जातियों के उत्थान में समाचार-पत्रों (Newspapers) ने बहुत सहायता की है। किसी भी सूचित जाती पर प्रशासकों द्वारा किए गए अत्याचारों की करुणापूर्ण कहानी के संदेश को सारे संसार में फैला कर अन्य देश या जाति वालों की संवेदना या सहानुभूति प्राप्त करने में समाचार-पत्र की सबसे अधिक सहायक सिद्ध हुए हैं। भारतवर्ष की राष्ट्रीय चेतना में सजग बनाने में समाचार पत्रों ने आशातीत योगदान दिया है। इसी का परिणाम है कि भारतवर्ष आज स्वतंत्रत है।

Disadvantages of Newspapers

समाचार पत्रों से हानियां समाचार पत्रों से जहां में इतने लाभ हैं वहां कुछ हानियां भी है, जहां समाचार पत्र हमारी सहायता करते हैं वहां अनेक बार उससे जनहित व राष्ट्रहित को भारी चोट पहुंचती है। स्वार्थी प्राणी अपने अपनी दूषित तथा विषैली विचारधाराओं को समाचार-पत्रों (Newspapers) में प्रकाशित करके दूसरी जाति या देश के प्रति घृणा-भावना उत्पन्न कर देते हैं। इससे राष्ट्र में अराजकता फैल जाती है, सांप्रदायिक उपद्रव होने लगते हैं तथा एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को शत्रुता की दृष्टि से देखने लगता है। चारित्रिक दृष्टि से भी समाचार-पत्र (Newspapers) कभी-कभी देश को पतन के गर्त में धकेल देते हैं। अश्लील विज्ञापनों तथा नगन चित्र द्वारा लोगों के विचार ही दूषित नहीं होते बल्कि उनका आत्मिक तथा मानसिक हा्स भी होता है। संवाददाताओं की निरंकुशता भी जनता को अखरने लगती है। झूठ को सच तथा सच को झूठ बनाने में ये लोग सिद्धहस्त होते हैं। अच्छे को बुरा कह देने का मतलब है कि ये लोग अपनी आत्मा तथा अपने देश के साथ अन्याय कर रहे हैं।

Uses of Newspapers in Hindi

आज स्वतंत्रता का युग है। जनता को अपने शासकों की आलोचना करने तथा उनके कार्य से असंतुष्ट होने पर उन्हें पदच्युत करने का अधिकार प्राप्त है। प्रत्येक मनुष्य को अपने विचार प्रकट करने का अधिकार है। अपने विचार जनता तक पहुंचाने के दो ही माध्यम हैं- समाचार पत्र तथा भाषण। भाषण का क्षेत्र सीमित है तथा समाचार-पत्रों (Newspapers) का विस्तृत। भारतवर्ष के स्वतंत्रता संग्राम में भी समाचार-पत्रों ने अद्वितीय योगदान दिया था। अतः सरकार को उन्हें अधिकाधिक स्वतंत्रता देनी चाहिए, परंतु साथ ही यह ध्यान भी देना चाहिए कि समाचार-पत्र निरंकुश शासक की भांति मनमानी न करें। समाचार-पत्रों का संतुलित रूप ही समाज के लिए लाभप्रद होगा।

Samachar Patra Essay in Hindi

समाचार पत्र पर निबंध – 2

समाचार पत्र या अख़बार, समाचारो पर आधारित एक प्रकाशन है। इसमे मुख्य रूप से ताजी घटनाएँ, खेल-कूद, व्यक्तित्व, राजनीति व विज्ञापन की जानकारियाँ सस्ते कागज पर छपी होती है। समाचार पत्र संचार के साधनो में महत्वपुर्ण स्थान रखते हैं । ये कागज़ पर शब्दों से बनें वाक्यों को लिख कर या छाप कर तेयार किये जाते हैं। समाचार पत्र प्रायः दैनिक होते हैं लेकिन कुछ समाचार पत्र साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक एवं छमाही भी होतें हैं। अधिकतर समाचारपत्र स्थानीय भाषाओं मे और स्थानीय विषयों पर केन्द्रित होते है।

समाचारपत्रो का इतिहास : सबसे पहला ज्ञात समाचारपत्र 59 ई0 का “द रोमन एक्टा डिउरना” है। जूलिएस सीसर ने जनसाधरण को महत्वपूर्ण राजनैतिज्ञ और समाजिक घटनाओं से अवगत कराने के लिए उन्हे शहरो के प्रमुख स्थानो पर प्रेषित किया। 8वी शताब्दी मे चीन मे हस्तलिखित समाचारपत्रो का प्रचलन हुआ।

अखबार का इतिहास और योगदान यूँ तो ब्रिटिश शासन के एक पूर्व अधिकारी के द्वारा अखबारों की शुरुआत मानी जाती हैए लेकिन उसका स्वरूप अखबारों की तरह नहीं था। वह केवल एक पन्ने का सूचनात्मक पर्चा था। पूर्णरूपेण अखबार बंगाल से “बंगाल गज़ट” के नाम से वायसराय हिक्की द्वारा निकाला गया था। आरंभ में अँग्रेजों ने अपने फायदे के लिए अखबारों का इस्तेमाल कियाए चूँकि सारे अखबार अँग्रेजी में ही निकल रहे थे, इसलिए बहुसंख्यक लोगों तक खबरें और सूचनाएँ पहुँच नहीं पाती थीं।

जो खबरें बाहर निकलकर आती थीं। उन्हें काफी तोड़.मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता थाए ताकि अँग्रेजी सरकार के अत्याचारों की खबरें दबी रह जाएँ। अँग्रेज सिपाही किसी भी क्षेत्र में घुसकर मनमाना व्यवहार करते थे। लूटए हत्याए बलात्कार जैसी घटनाएँ आम होती थीं। वो जिस भी क्षेत्र से गुजरते, वहाँ अपना आतंक फैलाते रहते थे। उनके खिलाफ न तो मुकदमे होते और न ही उन्हें कोई दंड ही दिया जाता था। इन नारकीय परिस्थितियों को झेलते हुए भी लोग खामोश थे। इस दौरान भारत में “हिंदुस्तान टाइम्सष”, “नेशनल हेराल्ड”, “पायनियर”, “मुंबई मिरर” जैसे अखबार अँग्रेजी में निकलते थे। जिसमें उन अत्याचारों का दूर-दूर तक उल्लेख नहीं रहता था।

इन अँग्रेजी पत्रों के अतिरिक्त बंगलाए उर्दू आदि में पत्रों का प्रकाशन तो होता रहाए लेकिन उसका दायरा सीमित था। उसे कोई बंगाली पढ़ने वाला या उर्दू जानने वाला ही समझ सकता था। ऐसे में पहली बार 30 मई, 1826 को हिन्दी का प्रथम पत्र ष्उदंत मार्तंडष् का पहला अंक प्रकाशित हुआ।

यह पत्र साप्ताहिक था। उदंत-मार्तंड की शुरुआत ने भाषायी स्तर पर लोगों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। यह केवल एक पत्र नहीं थाए बल्कि उन हजारों लोगों की जुबान था, जो अब तक खामोश और भयभीत थे। हिन्दी में पत्रों की शुरुआत से देश में एक क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ और आजादी की जंग को भी एक नई दिशा मिली। अब लोगों तक देश के कोने-कोन में घट रही घटनाओं की जानकारी पहुँचने लगी। लेकिन कुछ ही समय बाद इस पत्र के संपादक जुगल किशोर को सहायता के अभाव में 11 दिसंबरए 1827 को पत्र बंद करना पड़ा।

10 मई 1829 को बंगाल से हिन्दी अखबार श्बंगदूतश् का प्रकाशन हुआ। यह पत्र भी लोगों की आवाज बना और उन्हें जोड़े रखने का माध्यम। इसके बाद जुलाईए 1854 में श्यामसुंदर सेन ने कलकत्ता से समाचार सुधा वर्षण का प्रकाशन किया। उस दौरान जिन भी अखबारों ने अँग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोई भी खबर या आलेख छपा, उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ी। अखबारों को प्रतिबंधित कर दिया जाता था। उसकी प्रतियाँ जलवाई जाती थीं, उसके प्रकाशकों, संपादकों, लेखकों को दंड दिया जाता था। उन पर भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाता था, ताकि वो दुबारा फिर उठने की हिम्मत न जुटा पाएँ।

आजादी की लहर जिस तरह पूरे देश में फैल रही थी, अखबार भी अत्याचारों को सहकर और मुखर हो रहे थे। यही वजह थी कि बंगाल विभाजन के उपरांत हिन्दी पत्रों की आवाज और बुलंद हो गई। लोकमान्य तिलक ने “केसरी” का संपादन किया और लाला लाजपत राय ने पंजाब से “वंदे मातरम” पत्र निकाला।

इन पत्रों ने युवाओं को आजादी की लड़ाई में अधिक से अधिक सहयोग देने का आह्वान किया। इन पत्रों ने आजादी पाने का एक जज्बा पैदा कर दिया। केसरी को नागपुर से माधवराव सप्रे ने निकाला, लेकिन तिलक के उत्तेजक लेखों की वजह से यह पत्र बंद कर दिया गया।

उत्तर भारत में आजादी की जंग में जान फूँकने के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1913 में कानपुर से साप्ताहिक पत्र “प्रताप” का प्रकाशन आरंभ किया। इसमें देश के हर हिस्से में हो रहे अत्याचारों के बारे में जानकारियाँ प्रकाशित होती थीं। इससे लोगों में आक्रोश भड़कने लगा था और वे ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए और भी उत्साहित हो उठे थे। इसकी आक्रामकता को देखते हुए अँग्रेज प्रशासन ने इसके लेखकों, संपादकों को तरह-तरह की प्रताड़नाएँ दीं। लेकिन यह पत्र अपने लक्ष्य पर डटा रहा।

इसी प्रकार बंगालए बिहार, महाराष्ट्र के क्षेत्रों से पत्रों का प्रकाशन होता रहा। उन पत्रों ने लोगों में स्वतंत्रता को पाने की ललक और जागरूकता फैलाने का प्रयास किया। अगर यह कहा जाए कि स्वतंत्रता सेनानियों के लिए ये अखबार किसी हथियार से कमतर नहीं थेए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

अखबार बने आजादी का हथियार प्रेस आज जितना स्वतंत्र और मुखर दिखता है। आजादी की जंग में यह उतनी ही बंदिशों और पाबंदियों से बँधा हुआ था। न तो उसमें मनोरंजन का पुट था और न ही ये किसी की कमाई का जरिया ही। ये अखबार और पत्र-पत्रिकाएँ आजादी के जाँबाजों का एक हथियार और माध्यम थे, जो उन्हें लोगों और घटनाओं से जोड़े रखता था।

आजादी की लड़ाई का कोई भी ऐसा योद्धा नहीं थाए जिसने अखबारों के जरिए अपनी बात कहने का प्रयास न किया हो। गाँधीजी ने भी हरिजन और यंग इंडिया के नाम से अखबारों का प्रकाशन किया था तो मौलाना अबुल कलाम आजाद ने “अल हिलाल” पत्र का प्रकाशन। ऐसे और कितने ही उदाहरण हैं, जो यह साबित करते हैं कि पत्र-पत्रिकाओं का आजादी की लड़ाई में महत्व रहा था।

यह वह दौर थाए जब लोगों के पास संवाद का कोई साधन नहीं था। उस पर भी अँग्रेजों के अत्याचारों के शिकार असहाय लोग चुपचाप सारे अत्याचर सहते थे। न तो कोई उनकी सुनने वाला था और न उनके दुरूखों को हरने वाला। वो कहते भी तो किससे और कैसे, हर कोई तो उसी प्रताड़ना को झेल रहे थे। ऐसे में पत्र-पत्रिकाओं की शुरुआत ने लोगों को हिम्मत दी, उन्हें ढाँढस बँधाया।

यही कारण था कि क्रांतिकारियों के एक-एक लेख जनता में नई स्फूर्ति और देशभक्ति का संचार करते थे। भारतेंदु का नाटक “भारत दुर्दशा” जब प्रकाशित हुआ था तो लोगों को यह अनुभव हुआ था कि भारत के लोग कैसे दौर से गुजर रहे हैं और अँग्रेजों की मंशा क्या है।

Essay on Samachar Patra Ka Mahatva in Hindi Language

समाचार पत्र का महत्व : हिंदी निबंध 3 

हमारे दैनिक जीवन में समाचार पत्र का अत्यन्त महत्व है। दुनिया का शायद ही ऐसा कोई देश हो, जहाँ के लोग समाचार पत्र न पढ़ते हों। सुबह होते ही लोगों को समाचार पत्र की सुध हो जाती है। इससे लोगों को विश्व की तमाम महत्वपूर्ण जानकारियां कुछ ही क्षणों में प्राप्त हो जाती है।

समाचार-पत्र का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। प्रथम ज्ञात समाचार पत्र 59 ई0 पू0 का ’’द रोमन एक्टा डिउरना’’ है। भारत में समाचार-पत्र की शुरूआत श्बंगाल गजटश् नामक पत्रिका के साथ हुई। हिन्दी में प्रथम दैनिक समाचार-पत्र ‘‘उदंत मार्तण्ड’’ का प्रकाशन 30 मई 1826 ई0 को हुआ। समाचार पत्र का वर्गीकरण तीन रूपों में किया जा सकता है।

प्रथम, दैनिक समाचार-पत्र हैं, जो प्रतिदिन प्रकाशित होते हैं और प्रतिदिन होने वाली घटनाओं को प्रस्तुत करते हैं। द्वितीय, साप्ताहिक समाचार-पत्र हैं, जो पूरे सप्ताह में एक बार ही प्रकाशित होते हैं। ऐसे समाचार-पत्रों में पूरे सप्ताह भर के खबरों को संकलित कर प्रस्तुत किया जाता है। तृतीय, मासिक समाचार-पत्र हैं, जिससे हमें पूरे महीने होने वाली घटनाओं का पुनराभास हो जाता है।

आज विश्व भर में हजारों दैनिक, साप्ताहिक और मासिक समाचार-पत्र उपलब्ध हैं, जो अनेक भाषाओं में छापे जाते हैं। भारत के प्रमुख समाचार पत्रों में अमर उजाला, दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, आदि हिंदी तथा द टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दु, द इंडियन एक्सप्रेस, डेक्कन हेराल्ड, आदि अंग्रेजी समाचार पत्र हैं।

समाचार-पत्र को समाज का दर्पण कहा जाता है, क्योंकि यह उन समस्त घटनाओं को जो प्रतिदिन घटती हैं यथासंभव वैसे ही हमारे सन्मुख प्रस्तुत करता है। इनमें देश-विदेश की घटनाओं, रोजगार, प्रचार, मनोरंजन, उदघोषणाओं आदि की लिखित जानकारियाॅं होती हैं। कुछ ही पलों में हम इनके अध्ययन से अपने आस-पास की खबरों के साथ-साथ, देश-विदेश के अनेक प्रांतों में क्या हो रहा है घर बैठे जान जाते हैं।

हम इसके माध्यम से अपने संदेश, उद्घोषणाएँ, शिकायत आदि प्रचारित कर सरकार सहित आम जनता को सूचित कर सकते हैं। संपादकों तथा पत्रकारों के माध्यम से समाज में होने वाले आपराधिक कृत्यों, अपराधों आदि को रोकने में तथा जन-जागरण में मदद मिलती है। यह नौजवानों को नई दिशा तो प्रदान करता ही है, लेकिन साथ ही बच्चों की अभिरूचि पढ़ाई में लाता है। अनेक समाचार-पत्रों में बच्चों के लिए विशेष काॅलम होते हैं।

समाचार-पत्र का मूल्य पुस्तकों की तुलना में अत्यन्त कम होता है। अतः समाचार के हर तबके के लोगों तक इसकी पहुॅंच है। इनके नियमित अध्ययन से हमें पुस्तकों से कहीं अधिक रोचक और ज्ञानवर्द्धक जानकारियाॅं प्राप्त हो जाती हैं। हालाॅंकि समाचार-पत्रों में अनेक गैर-जरूरी सूचनाएँ छाप दी जाती हैं, जिससे लोग दिग्भ्रमित हो जाते हैं। अतः ऐसे खबरों तथा सूचनाओं के प्रकाशन से पूर्व संपादक को इनके दुष्प्रभावों का आंकलन जरुर कर लेना चाहिए।

समाचार-पत्र समाज को उसकी वास्तिविक छवि दिखाता है न कि सिर्फ़ व्यवसाय का साधन। आज के जमाने में खबरों को तोड़-मरोड़ कर समाज में दिखाया जाता है इसलिए इनके प्रकाशक को खबरों की विश्वसनियता और महत्वत्ता को बनाए रखना होगा, तभी ये समाचार-पत्र किसी भी समाज के लिए वरदान साबित होगी।

Speech on Newspaper in Hindi

अख़बार/समाचार पत्र पर भाषण

प्रिय साथियों – आज मैं आपका इस भाषण समारोह में स्वागत करता हूं। मैं, अक्षत खन्ना, आज के लिए आपका मेजबान, अखबार/समाचार पत्र के बढ़ते महत्व के बारे में अपने भाषण को संबोधित करना चाहूंगा। लेकिन इससे पहले मैं आपसे अख़बार/समाचार पत्र की परिभाषा पूछना चाहता हूँ। एक अखबार को आप कैसे परिभाषित करेंगे? अख़बार/समाचार पत्र प्रिंट मीडिया की श्रेणी में आता है और इसे राष्ट्रीय और साथ ही वैश्विक स्तर के समाचारों के एक भंडार के रूप में परिभाषित किया गया है। यह एक प्रिंटेड मटेरियल है जिसका प्राथमिक उद्देश्य लोगों को नवीनतम ख़बरों और घटनाओं के साथ उन्हें अपडेट करना है।

सूचना हर संभव दिशा अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से अखबार/समाचार पत्र के माध्यम से हमारे पास आती है टेक्नोलॉजी और प्रिंट मीडिया में क्रांति से डिजिटल मीडिया में भारी बदलाव के बावजूद आज की आधुनिक दुनिया अभी भी समाचार पत्रों की उपस्थिति के बिना अधूरी पाई जाती है। इस प्रकार अखबार/समाचार पत्र केवल एक मुद्रित कागज़ का टुकड़ा नहीं है बल्कि एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है जिसमें महत्वपूर्ण जानकारी, खबर, नवीनतम घटनाएँ, विज्ञापन, समीक्षा आदि शामिल हैं। अख़बारों/समाचार पत्रों को दुनिया के कान और आँखें कहा जा सकता है। आज की स्मार्ट फोन और टैबलेट्स की दुनिया में कुछ लोगों की सुबह अख़बार/समाचार पत्र पढ़े बिना शुरू नहीं होती है।

अख़बार/समाचार पत्र के बिना एक दिन की कल्पना करना भी संभव नहीं है क्योंकि इसके बिना लोग हर सुबह खुद को कैसे अपडेट करेंगे। इसलिए समाचार पत्र हमारे दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अख़बार/समाचार पत्र हमें हर संभव विषय जैसे विज्ञान, कला, खेल व्यापार, अपराध, फैशन आदि पर जानकारी प्रदान करता है। अखबार के प्रत्येक पेज का अपना महत्व होता है। यह हमें न केवल हमारे देश में क्या हो रहा है बल्कि अन्य देशों की ख़बरों के बारे में भी जागरूक बनाता है। इसके बाद स्वास्थ्य के विकास के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए स्वास्थ्य का कॉलम भी है। जहाँ तक मनोरंजन का संबंध है क्रॉसवर्ड पहेली, हास्य कार्टून के साथ-साथ ज्योतिषीय तथ्यों का भी एक कॉलम है। अख़बारों/समाचारपत्रों में विवाह, नौकरी रिक्तियों आदि के लिए कॉलम भी आते हैं।

अख़बार/समाचार पत्र विज्ञापन से भरा हुआ होता है क्योंकि अखबार/समाचार पत्र एजेंसियों के लिए कमाई का एक श्रेष्ठ स्रोत है। इसलिए अखबार पढ़ना एक अच्छी आदत है और इसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और अगर आपके अंदर ये आदतें नहीं हैं तो आपको इसे उत्पन्न करने की कोशिश करनी चाहिए ताकि दुनिया भर में क्या हो रहा है और इसके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर सके। दूसरी ओर अखबार/समाचार पत्र हजारों लोगों को रोजगार प्रदान करता है और कई लोगों के लिए आय का एक अच्छा स्रोत है – न केवल एजेंसियों के लिए बल्कि लेखकों, संपादकों, विपणन टीम आदि के लिए भी।

वास्तव में जो लोग सड़क पर अख़बार/समाचार पत्र बेचते हैं या बाटते हैं उन्हें सड़क पर अपनी आजीविका अर्जित करने का एक स्रोत मिल जाता है। अखबार/समाचार पत्र सभी प्रमुख भाषाओं में छपा हुआ होता हैं ताकि आपको अख़बार पढ़ने में सक्षम होने के लिए अपनी भाषा में बदलाव न करना पड़े। कुछ स्कूलों में यह नियम है कि हर सुबह सभी छात्रों को अपने साथियों के साथ समाचार पढ़ना होगा। इसलिए हमारे जीवन में हम चाहे कितने भी व्यस्त हो हमें कभी भी अखबार/समाचार पत्र पढ़ने की आदत में कटौती नहीं करनी चाहिए और जितनी भी हो सके उतनी जानकारी हमें लेनी चाहिए। धन्यवाद!

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