Essay on Illiteracy in Hindi | निरक्षरता पर निबंध (Niraksharta Par Nibandh)

Ashiksha Ek Abhishap in Hindi Essay (Niraksharta Ek Abhishap Hai Nibandh)

निरक्षरता एक अभिशाप निबंध 

निरक्षरता का सामान्य अर्थ है-अक्षरों की पहचान तक न होना। निरक्षर व्यक्ति के लिए तो ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ होता है। जो व्यक्ति पढ़ना-लिखना एकदम नहीं जानता, अपना नाम तक नहीं पढ़-लिख सकता, सामने लिखी संख्या तक को नहीं पहचान सकता है उसे निरक्षर कहा जाता है। निरक्षर व्यक्ति न तो संसार को जान सकता है और न ही अपने साथ होने वाले लिखित व्यवहार को समझ सकता है, इसीलिए निरक्षरता (illiteracy) को अभिशाप माना जाता है।

आज के अर्थात् इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करने वाले ज्ञान-विज्ञान के इस प्रगतिशील युग में भी कोई व्यक्ति या देश निरक्षर हो तो इसे एक त्रासदी के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता परन्तु यह तथ्य सत्य है कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विस्तार हो जाने पर भी भारत में निरक्षरों तथा अनपढ़ों की बहुत अधिक संख्या है। इस बात को भली-भांति जानते हुए कि निरक्षर व्यक्ति को तरह-तरह की हानियाँ उठानी पड़ती हैं, उन्हें कई तरह की विषमताओं का शिकार होना पड़ता है, वे लोग साक्षर बनने का प्रयास नहीं करते हैं।

यदि हम प्रगति तथा विकास कार्यों से प्राप्त हो सकने वाले सकल लाभ को प्राप्त करना चाहते हैं तो हम सबको साक्षर बनना होगा अर्थात् निरक्षरता को समाप्त करना होगा।

व्यक्तिगत स्तर पर भी निरक्षर व्यक्ति को कई तरह के कष्टों का सामना करना पड़ता है। वह न तो किसी को स्वयं कुशल-क्षेम जानने वाला पत्र ही लिख सकता है और न ही किसी से प्राप्त पत्र को पढ़ ही सकता है। निरक्षर व्यक्ति न तो कहीं मनीआर्डर भेज सकता है और न ही कहीं से आया मनीआर्डर अपने हस्ताक्षरों से प्राप्त कर सकता है, ऐसी दोनों स्थितियों में वह ठगा जा सकता है। देहाती निरक्षरों से तो अंगूठे लगवाकर जमींदार व महाजन उनकी जमीनों के टुकड़े तक हड़प कर चुके हैं। ऐसा अनेक बार होता देखा गया है, इसीलिए निरक्षरता को अभिशाप माना जाता है।

इस निरक्षरता के अभिशाप को मिटाने के लिए आजकल साक्षरता का अभियान जोर-शोर से चलाया जा रहा है। महानगरों, नगरों, कस्बों व देहातों में लोगों को साक्षर बनाने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। अधिकतर निरक्षर लोग मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग होते हैं इसलिए उनके लिए सुबह-शाम घरों के पास पढ़ाई की व्यवस्था की जाती है।

गृहणियों के लिए दोपहर के खाली समय में पढ़-लिख पाने की मुफ्त व्यवस्था की जाती है। इनके लिए पुस्तक कापी की भी मुफ्त व्यवस्था की जाती है। यहाँ तक कि घर-घर जाकर भी साक्षर बनाने के अभियान चलाये जा रहे हैं। इन सबसे लाभ उठाकर हम निरक्षरता (illiteracy) के अभिशाप से मुक्ति पा सकते हैं। साक्षर होना या साक्षर बनाना आज के युग की विशेष आवश्यकता है।


Essay on Ashiksha in Hindi Language 

अशिक्षा एक अभिशाप निबंध 

हमारे देश में छ: करोड़ तीस लाख बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने स्कूल का मुंह नहीं देखा। जाहिर है इसकी वजह भारत जैसे विकासशील देश की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि है। ऐसे में गरीब ग्रामीण परिवारों की ज्यादातर लड़कियों के लिए स्कूल जाना एक स्वप्न है। गांवों में यह देखकर दु: ख होता है कि पांच से सात वर्ष की आयु की लड़कियाँ दस-दस घंटे काम करती हैं। ऐसे परिवारों के बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही अपने परिवार या अपने माता-पिता के काम में हाथ बंटाने लगते हैं। इस प्रकार जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं लड़कों के मुकाबले लड़कियों पर काम का बोझ बढ़ता जाता है।

वर्ष 1998-99 के आंकड़ों के अनुसार केरल और हिमाचल प्रदेश ही ऐसे राज्य हैं जहाँ छ: से चौदह वर्ष तक की स्कूल न जाने वाली लड़कियों की संख्या पांच प्रतिशत से कम है। स्त्री शिक्षा का स्तर शेष देश में चिन्ताजनक है। इसकी एक अहम वजह यह भी है कि दूरदराज के कई ग्रामीण इलाकों में स्कूल प्राय: इतने दूर होते हैं कि परिवार वालों की राय में लड़कियों को वहाँ भेजना जोखिम भरा होता है। ग्रामीण इलाकों में महिला अध्यापकों के न होने के कारण भी लड़कियाँ स्कूल जाने से हिचकती हैं। या फिर वे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं। गांव ही नहीं शहरों में भी ऐसे बहुत से स्कूल हैं जहाँ अध्यापक हैं तो पढ़ने के लिए कमरे नहीं, यदि कमरे हैं तो अध्यापक नहीं हैं। यदि सब सुविधा है तो अध्यापक स्कूल से गायब मिलेंगे।

विभिन्न राज्यों में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में स्कूलों के शिक्षकों के हजारों पद खाली पड़े हैं। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुड़ी स्थायी संसदीय समिति भी अपनी 93वीं रिपोर्ट में इस तथ्य पर चिंता जता चुकी है। दूरदराज के गांवों तथा आदिवासी इलाकों में अव्वल तो स्कूलों की संख्या बहुत कम हैं जो हैं भी उनमें अध्यापक जाने में रुचि नहीं दिखाते। ग्रामीण बच्चों की सुविधा के लिए स्कूल एक किलोमीटर के दायरे में खोले गये हैं। इनका सर्वेक्षण करने पर पता चला कि इन स्कूलों में पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं। स्कूलों की इमारत खस्ताहाल है। सर्वेक्षण के अनुसार 84 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय नहीं पाये गये तथा 54 प्रतिशत स्कूलों में पीने का पानी नहीं था। पुस्तकालय, खेल के मैदान किताबों की बात तो दूर 12 प्रतिशत स्कूलों में केवल एक ही अध्यापक थे। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को सार्थक शिक्षा देने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

आज से 90 वर्ष पूर्व ‘सभी को शिक्षा’ नीति की परिकल्पना गोपाल कृष्ण गोखले ने की थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब भारत का संविधान बना तो उसमें भी चौदह साल तक के सभी बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा और अनिवार्य शिक्षा देने की बात कही गयी साथ ही यह भी कहा गया कि इस लक्ष्य को हमें 1960 तक हासिल कर लेना है। लेकिन यह लक्ष्य बीसवीं सदी तक तो पूरा हो नहीं सका । अब इसे वर्ष 2010 तक के लिए बढ़ा दिया गया है।

मनुष्य के विकास में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा से मनुष्य का जहाँ सर्वांगीण विकास होता है वहीं वह उसका आर्थिक और सामाजिक उत्थान करने की सामर्थ्य भी देती है। इस प्रकार बौद्धिक स्तर के साथ-साथ मनुष्य का जीवन स्तर भी ऊंचा उठता है, विशेषकर स्त्रियों में। महिला शक्तिकरण में भी शिक्षा का अहम योगदान है। लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार द्वारा समय-समय पर कई कार्यक्रम बनाये गये लेकिन उनमें साक्षरता की गति विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों में उतनी नहीं बढ़ी है जितनी बढ़नी चाहिए थी।

यदि हम सरकार की मानें तो उसके अनुसार देश के 98 प्रतिशत जिलों में सरकारी साक्षरता अभियान चलाया जा रहा है। स्कूल की बात तो दूर लड़कियों को स्नातक तक की शिक्षा निशुल्क देने की बात कही गयी है। लड़कियाँ इतनी ऊंची कक्षाओं तक पहुँचें इसके लिए ज़रूरी है कि वे पहले स्कल तो जाएँ। हमारे संविधान तथा पंचवर्षीय योजनाओं में शिक्षाओं पर जोर दिया गया है लेकिन देश की कुल साक्षरता के आंकड़ों में लिंग भेद स्पष्ट नजर आता है। देशभर में केरल, मेघालय तथा मिजोरम राज्य ऐसे हैं जहाँ स्त्री-पुरुष के बीच साक्षरता का अन्तर दस प्रतिशत से कम है।

हम हमेशा इसी विवाद में उलझकर रह गये कि प्राथमिक शिक्षा को बुनियादी आधार बनाया जाए कि नहीं। शिक्षा भले ही हमारे मूलभूत आवश्यकताओं में से एक हो पर सरकार शिक्षा पर कुल घरेलू सकल उत्पाद का मात्र छः प्रतिशत व्यय करती है। इसमें प्राथमिक शिक्षा का हिस्सा आज भी नाम मात्र को है। बेहतर होगा कि निरक्षरता उन्मूलन के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में वहीं के पढ़े-लिखे युवाओं को जिम्मेदारी सौंपी जाए।


Essay on Illiteracy in India

निरक्षरता को कैसे मिटाएँ

महान दार्शनिक अरस्तू ने शिक्षा के सम्बंध में कहा है-“निरक्षर होने से पैदा न होना अच्छा है।” इस कथन से शिक्षा का महत्त्व स्वतः सिद्ध हो जाता है। शिक्षा मानव को सुसंस्कृत बनाती है। शिक्षा के माध्यम से ही मनुष्य अपने असाध्य जीवन को साध्य बना सकता है।

महात्मा गाँधी ने कहा है-“शिक्षा से अभिप्राय बालक एवं मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा में निहित सर्वोत्तम शक्तियों के सर्वांगीण प्रगटीकरण से है।” साहित्यकारों ने विद्याहीन निरक्षर मनुष्य को पशु के समान बताया है।

आज भारत में करोड़ों लोग निरक्षर हैं। अधिकांश निरक्षर लोग गाँवों में हैं। हालाँकि गाँवों में शिक्षा का विकास हो रहा है, परंतु फिर भी निरक्षरों
की संख्या गाँवों में सर्वाधिक है। हालाँकि सरकार का उद्देश्य इन लोगों को साक्षर बनाने के साथ-साथ कृषि विकास सम्बंधी जानकारी, स्वास्थ्य सम्बंधी जानकारी तथा औद्योगिक शिक्षा प्रदान करना भी है।

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भारत की अधिकांश जनता अशिक्षित है। किसी भी देश की उन्नति के लिए उस देश के नागरिकों का शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है जिससे वे व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेष्ट रहें। पंचवर्षीय योजनाओं में इसे स्थान दिया गया है जिससे कि निरक्षर स्त्री-पुरुष साक्षर होकर अपने दायित्वों को समझें और अपने जीवन का विकास करें।

निरक्षर मानव जीवन में साक्षरता का महत्त्वपूर्ण स्थान है। आधुनिक युग की जटिलताओं को देखते हुए निरक्षरों को शिक्षित करना अनिवार्य है। हमारी सामाजिक समस्याओं-जाति प्रथा, दहेज प्रथा, जनसंख्या नियंत्रण आदि का निवारण भी तभी संभव है जब हर व्यक्ति साक्षर हो।

शिक्षा के माध्यम से ही निरक्षर स्त्री-पुरुषों का जीवन स्तर ऊँचा उठाया जा सकता है। साक्षरता का उद्देश्य मात्र अक्षर ज्ञान देना नहीं है, अपितु मनुष्य के संपूर्ण जीवन को उन्नत बनाना है।

आज देश भर में साक्षरता अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान में कई एन।जी।ओ। (गैर-सरकारी संगठन) सक्रिय हैं। परंतु हमारे देश से निरक्षरता पूर्णतः तभी मिटेगी, जब हर व्यक्ति प्रयास करेगा। हालांकि देश की सरकार के साथ-साथ विश्व बैंक भी हमारी मदद कर रही है ताकि देश में कोई भी निरक्षर न रहे। इसके बावजूद हमें भी पूरी ईमानदारी से स्वयं प्रयास करने होंगे तभी प्रत्येक भारतीय साक्षर होगा।


Essay on Illiteracy in Hindi Language

निरक्षरता : निबंध

प्रस्तावनाः विकास का सम्बंध केवल कल-कारखाने, बांधों और सड़कों के बनाने से ही नहीं है, बल्कि इसका सम्बंध बुनियादी तौर पर मानव जीवन से है जिसका लक्ष्य है लोगों की भौतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उन्नति। साक्षरता मानव के विकास का अत्यन्त आवश्यक अंग है। यह अपनी बातों को दूसरों तक पहुंचाने का, नवीन जानकारी लेने का और ज्ञान-विज्ञान के आदान-प्रदान का अनिवार्य साधन है। वस्तुतः साक्षरता व्यक्ति की उन्नति और राष्ट्रोत्थान की प्रथम शर्त है।

चिन्तनात्मक विकासः 21वीं सदी के लिए भारत को अपनी तैयारी के साथ ही एक महाशक्ति के रूप में अपने आपको स्थापित करने के लिए पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को प्राप्त करना अत्यावश्यक है। किसी भी विकासशील समाज की तरह भारत भी लम्बे समय से प्रशासन के शासनतन्त्र को सुचारु रूप से चलाने हेतु एक चुस्त और उपादेय शिक्षा नीति और प्रणाली को लेकर व्यथित रहा है। निरक्षरता (illiteracy) हर राष्ट्र एवं समाज के लिए एक भयंकर अभिशाप है। देश की समस्त समस्याओं की जड़ है।

आज़ादी के 50 वर्ष बाद भी हम पूर्ण साक्षरता अभियान में सफल नहीं हो सके हैं। अन्य देशों की तुलना में भारत में निरक्षरता अत्यधिक है। इसका कारण है राष्ट्रीय आय का बहुत कम भाग शिक्षा पर व्यय किया जाता है। निरक्षरता को दूर करने के लिये एक ठोस राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भारत में ज़रूरत थी। इस दृष्टि से, भारत में अनेक कार्यक्रम बनाये गये; जैसे, प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम, ग्रामीण प्रकार्यवादी साक्षरता कार्यक्रम, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन आदि। परन्तु निरक्षरता उन्मूलन हेतु इन प्रयासों को विशेष सफलता नहीं मिली क्योंकि देश में विद्यमान अन्य जटिल समस्यायें इनकी सफलता में बाधक बन रही थीं।

अतः आवश्यकता महसूस की गई—स्वयंसेवी संगठनों के प्रयासों की एवं इस क्षेत्र में अधिकाधिक स्कूली एवं विश्वविद्यालयी छात्रों की। वर्तमान में यह सभी मिल-जुलकर देश से निरक्षरता के कलंक को मिटाने हेतु प्रयासरत हैं। इस दृष्टि से शिक्षा को सर्वव्यापी बनाया जा रहा है।

उपसंहारः राष्ट्र एवं समाज से यदि सभी समस्याओं का अन्त करना है तो एक मात्र प्रभावशाली उपाय है—निरक्षरता उन्मूलन। आज देश निरक्षरता के कारण ही अन्य देशों की तुलना में पिछड़ा हुआ है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सभी इस दिशा की ओर प्रयासरत एवं चिन्तित हैं। आज आवश्यकता युद्धस्तर पर अभियान चलाने की है।

गुरुकुल, ऋषिकुल और विद्यादान महाकल्याण वाली अवधारणाओं वाले देश भारत में आज इक्कीसवीं सदी के दरवाजे पर दस्तक देते हुये भी हम अगर ‘निरक्षरता उन्मूलन’ अथवा ‘साक्षरता अभियान’ जैसी आधारभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति पर राष्ट्रीय बहस-मुबाहसे की बात और मांग कर रहे हों तब हमारी स्थिति का दिवालियापन सहज ही समझा जा सकता है।

निरक्षरता को भारत में स्वाधीनता से पूर्व भी विकास में बाधक माना गया है और आज भी। निरक्षरता समाप्त होने पर ही भारत एक संगठित राष्ट्र बन सकता है और अपने नागरिकों को उच्च कोटि का जीवन प्रदान कर सकता है। अतः आवश्यक है कि शिक्षा को साधारण रूप से और निरक्षरता को विशेषरूप से देश की विकास प्रक्रिया में उच्च प्राथमिकता दी जाये और ऐसा किया भी गया है।

साक्षरता की क्या परिभाषा है? साक्षर कौन है? वह व्यक्ति ‘साक्षर’ है जो किसी भाषा को पढ़ व लिख सकता है। भारत के जनगणना आयोग ने 1991 में ऐसे व्यक्ति को ‘साक्षर’ माना हैं जो किसी भारतीय भाषा को ‘समझ के साथ’ पढ़ और लिख सकता है न कि केवल पढ़ और लिख सकता है। वे जो पढ़ सकते हैं परन्तु लिख नहीं सकते, साक्षर नहीं हैं। एक व्यक्ति को साक्षर मानने के लिए स्कूल में औपचारिक शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक नहीं है। सन 1968 में शिक्षा सम्बंधी राष्ट्रीय नीति का प्रस्ताव पारित किया गया जिसके अन्तर्गत शिक्षा के पुनर्निर्माण सम्बंधी सुझाव दिए गये थे। इसमें ये मानक सम्मिलित किये गए थे-

  1. प्रणाली में इस प्रकार का परिवर्तन जिससे कि उसका व्यक्तियों के जीवन से अधिक निकट का सम्बंध हो
  2. शिक्षा के अवसरों को बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयास
  3. सब चरणों पर शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सतत प्रयास
  4. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास पर बल और नैतिक और सामाजिक मूल्यों का संवर्धन।

1986 में शिक्षा की नीति पर बल दिया गया और सभी के लिए शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराने के प्रावधान पर जोर दिया गया था।

शिक्षा के क्षेत्र में पचास के दशक में कुछ उन्नति अवश्य हुई। मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं की संख्या 1951 में 2.31 लाख थी। 1991 में 7.55 लाख हो गई। साक्षरों की संख्या में तीन गुने से अधिक वृद्धि हुई अर्थात् 1951 में 16.7 प्रतिशत से 1991 में 52.11 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सम्पूर्ण जनसंख्या को ध्यान में रखते हुये 1991 में साक्षरता दर 42.94 प्रतिशत थी, जिसकी तुलना में 1981 में 36.23 प्रतिशत और 1971 में 29.48 प्रतिशत थी। अब शिक्षा सुविधाओं को परिमाणात्मक बनाने के साथ-साथ उसे गुणात्मक बनाने पर भी विशेष बल दिया जाता है। 1976 में शिक्षा का एकमात्र दायित्व राज्यों का था।

केन्द्र सरकार केवल उच्च शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा का समन्वय और मानदण्ड़ों का निर्धारण ही किया करती थी। 1976 में संवैधानिक संशोधन के द्वारा शिक्षा का दायित्व राज्यों एवं केन्द्र दोनों पर हो गया और 1985 तक 15 से 35 आयु समूह में निरक्षरता के उन्मूलन एवं सम्पूर्ण प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य की प्राप्ति पर जोर दिया गया। एक ओर समाज की सहभागिता की योजना बनाई गई और दूसरी ओर ‘ऑपरेशन ब्लेक बोर्ड’ का कार्यक्रम प्राथमिक स्कूलों में मूल सुविधाएँ उपलब्ध कराने हेतु क्रियान्वित किया गया। वर्तमान समय में खुली शिक्षा प्रणालियों एवं अनौपचारिक शिक्षा प्रणालियों को सभी स्तरों पर प्रोत्साहित किया जा रहा है, किन्तु फिर भी जनसंख्या वृद्धि की तुलना में निरक्षरता को समाप्त करने में अधिक प्रगति नहीं हो सकी है।

1991 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी जनसंख्या के 47.89 प्रतिशत व्यक्ति अथवा लगभग 40.4 करोड़ व्यक्ति निरक्षर हैं। आज स्वाधीनता के 50 वर्षों बाद भी निरक्षरता उन्मूलन में किये गये प्रयास विशेष सफल नहीं रहे, बल्कि यह संख्या निरन्तर बढ़ रही है और शताब्दी के अन्त तक संसार में सर्वाधिक निरक्षरों की संख्या अपने देश में होगी। साक्षरता दर में अखिल भारतीय कोटिक्रम में, केरल का प्रथम स्थान है और उसके बाद मिजोरम, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, नागालैण्ड, मणीपुर, गुजरात, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, पंजाब, सिक्किम, कर्नाटक, हरियाणा, असम, उड़ीसा और मेघालय आते हैं। दूसरी ओर निम्नतम साक्षरता दर से बिहार प्रथम स्थान पर है और इसके बाद राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश आते हैं।

यद्यपि भारत में साक्षरता दर 1981 में 43.56 प्रतिशत से बढ़कर 1991 में 52.11 प्रतिशत हो गई, फिर भी अचर पदों में निरक्षरों की संख्या 1951 में 29.42 करोड़ से बढ़कर 1991 में 48.19 करोड़ हो गई। निरक्षरता की दृष्टि से भारत अन्य देशों की तुलना में अत्यन्त पिछड़ा हुआ है। इसका कारण यह भी है कि यहाँ पर शिक्षा पर होने वाला व्यय अन्य देशों की तुलना में कम है। 1981 से कुल वार्षिक बजट का 1.2 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय होता था जबकि 1991 में यह बढ़कर 3.7 प्रतिशत हो गया। अमेरिका में 19.9 प्रतिशत, जापान में 19.6 प्रतिशत, रूस में 11.2 प्रतिशत और फ्रांस में 17.8 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय किया जाता है।

हमारे देश में महिलाओं में निरक्षरता (illiteracy) की समस्या और भी भयंकर है। भारत में 1991 में 24.76 करोड़ महिलाएँ निरक्षर थीं। निरक्षरता की प्रतिशत पुरुषों की 36.14 की तुलना में आज महिलाओं में 60.58 है। शहरी क्षेत्रों में महिला निरक्षरता 52.0 प्रतिशत है जबकि पुरुषों में 34.0 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों की 59.0 प्रतिशत की तुलना में महिलाओं की निरक्षरता दर 82.0 प्रतिशत है। बच्चों में भी निरक्षरता की स्थिति इतनी ही बुरी है। 6 से 14 वर्ष के आयु-समूह में भारत में 15.3 करोड़ बच्चे हैं। इनमें से लगभग 80 प्रतिशत बच्चे स्कूलों में दाखिल हैं। फिर भी 2.8 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल नहीं जाते।

अन्य प्रान्तों की तुलना में हिन्दी क्षेत्र में निरक्षरता अधिक है। हमारे देश के निरक्षर व्यक्तियों का पांचवाँ हिस्सा इस हिन्दी क्षेत्र में मिलता है। इस क्षेत्र के चार राज्यों—राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश को प्रोफेसर अशिश बोस ने ‘बिमारु क्षेत्र’ का नाम दिया है। 1961 में जब ‘बिमार क्षेत्र’ में साक्षरता दर 20.65 प्रतिशत थी, तब राष्ट्रीय स्तर पर यह 28.30 प्रतिशत थी। इसका एक बड़ा कारण यह है कि इन क्षेत्रों में निर्धनता एवं निरक्षरता में काफी घनिष्ठ सम्बंध है। इन राज्यों के गाँवों की स्थिति और अधिक गम्भीर है। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन ने जो साक्षरता अभियान का लक्ष्य जनसंख्या बनाया है उसका केवल 13.81 प्रतिशत इन ‘बिमारु क्षेत्र’ में है। चूंकि साक्षरता का आर्थिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अतः इन क्षेत्रों में साक्षरता कार्यक्रमों को अधिक महत्त्व दिया जाना अति आवश्यक है।

उपरोक्त सभी तथ्यों से स्पष्ट है कि निरक्षरता (illiteracy)अवश्य ही एक अभिशाप है और इसका उन्मूलन किया जाना अति आवश्यक है। इस दृष्टि से लोकसभा ने 1986 में शिक्षा की राष्ट्रीय नीति को स्वीकृति प्रदान की। उसने एक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली बनाने का प्रयास किया जिसमें निर्धारित किया गया कि; (i) पाठ्यक्रम का एक ऐसा ढांचा जोकि सारे देश में शिक्षा के विभिन्न चरणों के अन्त में योग्यता में समानता स्थापित करे, (ii) समाज और संस्कृति के समाकलनात्मक पहलू को सुदृढ़ करें और (iii) एक मूल्य व्यवस्था को स्थापित करे जो समतावादी, प्रजातान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष समाज के लिए आवश्यक है। शैक्षणिक परिवर्तन, असमानताओं को कम करना, प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण, प्रौढ़ शिक्षा और वैज्ञानिक एवं शिल्प वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे उपायों पर विशेष बल दिया गया।

राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली में यह व्यवस्था की गई कि सभी छात्रों को बिना लिंग, जाति और स्थान आदि का भेदभाव किए बिना समान शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है तथा देश के समस्त भागों में 10+2+3 शिक्षा व्यवस्था को लागू किया गया। 14 वर्ष की आयु तक सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा पद्धति को प्राथमिकता प्रदान की गई। निरक्षरता के उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय शैक्षणिक नीति ने यह प्रस्ताव रखा कि 15 से 35 आयु समूह में प्रौढ़ और सतत शिक्षा का विशाल कार्यक्रम विभिन्न माध्यमों के द्वारा कार्यान्वित किया जायेगा। विभिन्न माध्यम हैं:

(क) सतत शिक्षा के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में केन्द्रों की स्थापना,
(ख) मालिकों और सरकार की सम्बंधित एजेन्सियों द्वारा श्रमिकों की शिक्षा
(ग) रेडियो, दूरदर्शन और सिनेमा फ़िल्मों को व्यापक और सामूहिक शिक्षा का माध्यम बनाना,
(घ) शिक्षा प्राप्त करने वाले समूहों और संगठनों का गठन करना,
(ङ) दूरवर्ती शिक्षा कार्यक्रम और
(च) स्व-शिक्षा में सहयोग का आयोजन। इस योजना ने अनेक व्यक्तियों को लाभान्वित किया है। साथ ही इस शताब्दी के अन्त तक ‘सबको शिक्षा’ का लक्ष्य हासिल करने पर जोर दिया गया है।
मुख्य रूप से निरक्षरता (illiteracy) उन्मूलन हेतु हमारे देश में तीन उपाय किये गए हैं; प्रथम, राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम। द्वितीय, ग्रामीण प्रकार्यवादी साक्षरता कार्यक्रम। तृतीय, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन। राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम 2 अक्तूबर, 1978 को शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य निरक्षर व्यक्तियों को विशेष रूप से 15-35 आयु वर्ग के समूह में शिक्षा देना और साक्षरता के लिए प्रोत्साहित करना था। इसके कार्यक्रम हैं, लक्षित निरक्षर जनसंख्या को साक्षरता की प्रवीणताएँ सिखलाना, उनका प्रकार्यवादी विकास, सरकार की नीतियों एवं कानूनों के विषय में उनमें जागरूकता उत्पन्न करना। इसके अन्तर्गत स्त्रियों, बच्चों व समाज के कमजोर वर्गों की शिक्षा पर विशेष बल दिया जा रहा है। सभी स्वयं सेवकों एवं विद्यार्थियों से कहा जा रहा है कि वह साक्षरता का संदेश फैलाएँ एवं साक्षरता प्रदान करने का प्रयास करें।

ग्रामीण प्रकार्यवादी साक्षरता कार्यक्रम प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम का ही उप-कार्यक्रम है। यह मई, 1986 में प्रारम्भ किया गया था और इसमें एन। एस। एस और महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के अन्य छात्रों को ” प्रत्येक एक पढ़ाओ’ के सिद्धान्त पर सम्मिलित किया गया था। यह एक व्यापक कार्यक्रम है। इसके अनेक चरण हैं; मास्टर प्रशिक्षकों जिन्हें विद्यार्थी स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देना है, का चयन करना; ऐसे विद्यार्थी स्वयंसेवकों का, जो सच्चे और वास्तविक रूप से साक्षरता कार्य के प्रति प्रतिबद्ध हैं चयन करना और उन्हें प्रेरित और संगठित करना; 15-35 आयु वर्ग के साक्षर व्यक्तियों की पहचान करना ।जो किसी शिक्षा संस्था के पास रहे हों; विद्यार्थी स्वयंसेवकों एवं निरक्षर व्यक्तियों के बीच सम्बंध स्थापित करना और प्रत्येक स्वयंसेवक का कार्यक्षेत्र नियत करना; स्कूलों के वरिष्ठ अध्यापकों और प्रधानाध्यापकों द्वारा विद्यार्थी स्वयंसेवकों के कार्यक्रम को मानीटर करवाना; विभिन्न विकास विभागों अथवा एजेंसियों से इस प्रकार समन्वय स्थापित करना कि उनके अधिकारी उस स्थान पर जायें जहाँ स्वयंसेवक साक्षरता प्रदान कर रहा है, सीखने वालों को साक्षरता के लाभ बताएँ, चार्ट, पोस्टर और अन्य सामग्री उनको उपलब्ध कराएँ और उनकी वास्तविक कठिनाइयों की पहचान करें; निरक्षरों को पुस्तकालयों और वाचनालयों के माध्यम से उत्तर-साक्षरता गतिविधियाँ प्रदान करें। जनसंचार माध्यमों द्वारा कार्यक्रम की सूचना और समर्थन दिया जाना और उसके व्यापक प्रभाव का विश्वविद्यालय के प्रौढ़ और सतत शिक्षा विभागों द्वारा मूल्यांकन करना अत्यधिक ज़रूरी है।

प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में एक व्यापक कार्यक्रम बनाया गया जो राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के नाम से जाना जाता है। यह मई, 1988 में शुरू किया गया। इसका लक्ष्य था कि प्रकार्यवादी साक्षरता 15-35 आयु समूह के आठ करोड़ निरक्षरों को प्रदान की जाये। तीन करोड़ को 1990 तक और पांच करोड़ अन्य को 1995 तक। इसके अतिरिक्त यह मिशन श्रमिक विद्यापीठ और 16 राज्य संसाधन केन्द्र विभिन्न राज्यों में श्रमिकों को शिक्षा देने और कार्यक्रम को तकनीकी संसाधन सहायता प्रदान करने हेतु कार्यरत हैं। निरक्षरता (illiteracy) उन्मूलन के यह कार्यक्रम 1965 तक सफल नहीं हो सके थे क्योंकि उस समय देश खाने, रोजगार और स्वावलम्बन की समस्याओं से जूझ रहा था।

जनसंख्या वृद्धि के कारण भी निरक्षरों की संख्या में काफी वृद्धि हुई। यह सभी कार्यक्रम अभी तक स्थितियों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं ला पाये हैं। इनकी असफलता के कुछ अन्य कारण भी हैं, जैसे; इन कार्यक्रमों की निर्धारित अवधि लम्बी है। इसकी अवधि छह महीने है। लोग बीच में ही प्रोग्राम छोड़ देते हैं। अतः इसकी अवधि दो महीने रखनी चाहिए। निर्धारित किए गए साक्षरता प्रतिमान भी बहुत ऊँचे हैं। अंकगणित को लिखने व पढ़ने से पृथक् कर दो महीने बाद सिखाया जाना चाहिए इत्यादि। साथ ही देश को निष्क्रियता से बाहर निकालने के लिए विद्यार्थी शक्ति को भी काम में लेना अत्यधिक आवश्यक है।

अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सरकार अकेले ही निरक्षरता (illiteracy) को दूर नहीं कर सकती। इसको प्रभावी बनाने के लिए स्वयंसेवी संगठनों, विद्यार्थी एवं स्वयं बच्चों के माता-पिताओं को प्रभावशाली एवं सक्रिय भूमिका निभानी होगी। सीखने वालों और सिखाने वालों को निपुण प्रयास करने होंगे और इन सभी में प्रेरणाओं का समावेश किया जाना अत्यन्त आवश्यक है तभी इस समस्या से निजात पाई जा सकती है। इस दृष्टि से वर्तमान निरक्षरता उन्मूलन अभियान में धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों तथा पर्यावरण के संरक्षण पर भी बल दिया गया है। मद्यनिषेध, शांति व सांप्रदायिक सद्भाव के प्रसार का भी भारी दायित्व उठा लिया गया है। यही नहीं बालपोषण और मातृत्व की शिक्षा का भी इसमें समावेश है। उत्साहवर्द्धक तथ्य यह है कि निरक्षरता उन्मूलन अभियान में विभिन्न आयु वर्गों के छात्र-छात्राओं की भी भागीदारी बढ़ रही है। आज दस लाख विद्यार्थी इस अभियान से सम्बद्ध हैं।

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