Varsha Ritu Par Nibandh Aur Peoms | वर्षा ऋतु पर निबंध व कविताएँ

आज की इस पोस्ट में वर्षा ऋतु पर निबंध (Varsha Ritu Par Nibandh)  और वर्षा ऋतु पर कविताएँ (Varsha Ritu Poems) लिखी गयी है जो हर कक्षा के विद्यार्थी के लिए उपयोगी है। वर्षा ऋतु पर गुजराती भाषा (varsha ritu nibandh gujarati) में भी निबंध उपलब्ध है।

Varsha Ritu Essay in Hindi (वर्षा ऋतु निबंध : हिंदी)

निबंध : वर्षा ऋतु (हिंदी)

भारत में चार मुख्य ऋतुओं में वर्षा ऋतु (Varsha Ritu) एक है। यह हर साल गरमी के मौसम के बाद जुलाई से शुरु होकर सितंबर तक रहता है। जब मानसून आता है तो आकाश के बादल बरसते है । गर्मी के मौसम में तापमान अधिक होने के कारण पानी के संसाधन जैसे महासागर, नदी आदि वाष्प के रुप में बादल बन जाते है। वाष्प आकाश में इकट्ठा होती है और बादल बन जाते है जो वर्षा ऋतु (Varsha Ritu) में चलते है जब मानसून बहता है और बादल आपस में घर्षण करते है। इससे आसमानी बिजली चमकती और गरजती है और फिर बारिश होती है।

वर्षा ऋतु के अपने फायदे और नुकसान है। बारिश का मौसम सभी को अच्छा लगता है क्योंकि यह सूरज की तपती गर्मी से राहत देता है। यह पर्यावरण से सभी गर्मी को हटा देता है और एक ठडंक एहसास होता है। यह पेड़, पौधे, घास, फसल और सब्जियों आदि को बढ़ने में मदद करता है।

यह मौसम सभी जानवरों और पक्षियों को भी बेहद पसंद होता है क्योंकि उन्हें चरने के लिये ढ़ेर सारी घास और पीने के लिये पानी मिल जाता है। और इससे हमें दिन में दो बार गाय और भैंसों का दूध उपलब्ध हो जाता है। सभी प्राकृतिक संसाधन जैसे नदी और तालाब आदि पानी से भर जाते है।

जब बारिश होती है तो सभी सड़कें, उद्यान तथा खेल के मैदान आदि जलमग्न और कीचड़युक्त हो जाते है। इससे हमें रोज खेलने में बाधा उत्पन्न होती है। सूरज की उपयुक्त रोशनी के बिना सब कुछ बदबू करने लगता है। सूरज की रोशनी की कमी की वजह से बड़े स्तर पर संक्रामक बीमारियों (विषाणु, फफूंदी और बैक्टीरिया से होने वाली) के फैलने का खतरा बढ़ जाता है।

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वर्षा ऋतु (Varsha Ritu) में, भूमि की कीचड़ और संक्रमित वर्षा का पानी धरती के अंदर जाकर पानी के मुख्य स्रोत के साथ में मिलकर पाचन क्रियाओं के तंत्र को बिगाड़ देते है। भारी बारिश के कारण बाढ़ की संभावना भी बनी रहता है।

आखिरकार सभी के द्वारा वर्षा (Varsha Ritu) ऋतु को बहुत पसंद किया जाता है। हर तरफ हरियाली ही दिखाई देती है। पेड़, पौधे और लताओं में नयी पत्तियाँ आ जाती है। फूल खिलना शुरु हो जाते है। हमें आकाश में इन्द्र धनुष देखने का बेहतरीन मौका मिलता है। इस मौसम में सूरज भी लुका-छिपी खेलता है। मोर और दूसरे पक्षी अपने पंखों को फैलाकर झूमने लगते है। हम सभी वर्षा ऋतु का आनन्द स्कूल और घर दोनों जगह लेते है।


Varsha Ritu Nibandh Gujarati 

वर्षा ऋतु निबंध (गुजराती)

વરસાદની seasonતુ એ ભારતની ચાર મુખ્ય તુઓમાંની એક છે. તે દર વર્ષે જુલાઈથી ઉનાળાની seasonતુ પછી શરૂ થાય છે અને સપ્ટેમ્બર સુધી ચાલે છે. ચોમાસુ આવે ત્યારે આકાશના વાદળો વરસી જાય છે. ઉનાળાની seasonતુમાં તાપમાન toંચા હોવાને કારણે મહાસાગરો, નદીઓ વગેરે જેવા જળ સંસાધનો બાષ્પના સ્વરૂપમાં વાદળછાયું બની જાય છે. બાષ્પ આકાશમાં ભેગી કરે છે અને વાદળો બની જાય છે જે ચોમાસામાં વહેતી વખતે અને વાદળો એક બીજા વચ્ચે ઘર્ષણ થતાં વરસાદી મોસમમાં ફરે છે. આનાથી ચમકતા અને મેઘગર્જના થાય છે અને પછી વરસાદ પડે છે.

વરસાદની seasonતુમાં તેના ફાયદા અને ગેરફાયદા છે. દરેકને વરસાદની મોસમ ખૂબ ગમતી હોય છે, કારણ કે તે સૂર્યની જ્વલંત ગરમીથી રાહત આપે છે. તે પર્યાવરણમાંથી બધી ગરમી દૂર કરે છે અને એક રામરામનો અહેસાસ કરે છે. તે ઝાડ, છોડ, ઘાસ, પાક અને શાકભાજી વગેરે ઉગાડવામાં મદદ કરે છે. આ સિઝનમાં બધા પ્રાણીઓ અને પક્ષીઓ પણ પસંદ કરે છે કારણ કે તેમને ચરાવવા માટે ઘાસ અને પીવા માટે પાણી મળે છે. અને આ અમને દિવસમાં બે વખત ગાય અને ભેંસનું દૂધ આપે છે. તમામ કુદરતી સંસાધનો જેવા કે નદી અને તળાવ વગેરે પાણીથી ભરેલા છે.

જ્યારે વરસાદ પડે છે, ત્યારે બધા રસ્તા, બગીચા અને રમતનું મેદાન ડૂબી જાય છે અને કાદવ બની જાય છે. આ આપણને રોજિંદા રમવાથી અવરોધે છે. યોગ્ય સૂર્યપ્રકાશ વિના, બધું દુર્ગંધ મારવાનું શરૂ કરે છે. સૂર્યપ્રકાશનો અભાવ મોટા પ્રમાણમાં ચેપી રોગો (વાયરસ, માઇલ્ડ્યુ અને બેક્ટેરિયાથી થતા) ફેલાવાનું જોખમ વધારે છે. વરસાદની seasonતુમાં, જમીનની કાદવ અને ચેપગ્રસ્ત વરસાદી પાણી પાણીના મુખ્ય સ્ત્રોત સાથે પૃથ્વીની અંદર જાય છે અને પાચક તંત્રને બગાડે છે. ભારે વરસાદને કારણે પૂરની સંભાવના પણ છે.

છેવટે, વરસાદની seasonતુ બધા દ્વારા ખૂબ પસંદ આવી છે. લીલોતરી બધે જોવા મળે છે. વૃક્ષો, છોડ અને વેલામાં નવા પાંદડા આવે છે. ફૂલો ખીલવા માંડે છે. આપણને ઈન્દ્રને આકાશમાં ધનુષ્ય જોવા માટેની એક મહાન તક મળે છે. સૂર્ય પણ આ મોસમમાં છુપાવો અને શોધે છે. મોર અને અન્ય પક્ષીઓ તેમની પાંખો ફેલાવે છે અને સ્વિંગ શરૂ કરે છે. આપણે બધા શાળા અને ઘરે બંને વરસાદી માહોલની મજા માણીએ છીએ.


Varsha Ritu Poem in Hindi – वर्षा ऋतु हिंदी कविता 

वर्षा ऋतु कविता - 1

सावन बीत चुका है कब का
लो भादो भी बीता जाता
बरखा रानी कब आओगी?

सपनों के काग़ज़ की कितनी नाव बनाए
बैठा हूँ मैं, अरमानों के जाने कितने
बोझ उठाए बैठा हूँ मैं।

आँखें मेरी सूखे बादल सा साजन मेरा
तुम-सा निर्दय बरस के खुद प्रिय को मेरे
क्या प्रेरित तुम कर पाओगी?

वर्षा ऋतु कविता - 2

बारिश का मौसम है आया ।

हम बच्चों के मन को भाया ।।

‘छु’ हो गई गरमी सारी ।

मारें हम मिलकर किलकारी ।।

काग़ज़ की हम नाव चलाएँ ।

छप-छप नाचें और नचाएँ ।।

मज़ा आ गया तगड़ा भारी ।

आँखों में आ गई खुमारी ।।

गरम पकौड़ी मिलकर खाएँ ।

चना चबीना खूब चबाएँ ।।

गरम चाय की चुस्की प्यारी ।

मिट गई मन की ख़ुश्की सारी ।।

बारिश का हम लुत्फ़ उठाएँ ।

सब मिलकर बच्चे बन जाएँ ।।

वर्षा ऋतु कविता - 3 - बरसात की बहारें

हैं इस हवा में क्या-क्या बरसात की बहारें।
सब्जों की लहलहाहट ,बाग़ात की बहारें।
बूँदों की झमझमाहट, क़तरात की बहारें।
हर बात के तमाशे, हर घात की बहारे।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

बादल लगा टकोरें , नौबत की गत लगावें।
झींगर झंगार अपनी , सुरनाइयाँ बजावें।
कर शोर मोर बगले , झड़ियों का मुँह बुलावें।
पी -पी करें पपीहे , मेंढक मल्हारें गावें।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

क्या – क्या रखे हए है या रब सामान तेरी कुदरत।
बदले है रंग क्या- क्या हर आन तेरी कुदरत।
सब मस्त हो रहे हैं , पहचान तेरी कुदरत।
तीतर पुकारते है , ‘सुबहान तेरी कुदरत’।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

जो मस्त हों उधर के , कर शोर नाचते हैं।
प्यारे का नाम लेकर ,क्या जोर नाचते हैं।
बादल हवा से गिर – गिर, घनघोर नाचते हैं।
मेंढक उछल रहे हैं ,और मोर नाचते हैं।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

कितनों तो कीचड़ों की, दलदल में फँस रहे हैं।
कपड़े तमाम गंदे , दलदल में बस रहे हैं।
इतने उठे हैं मर – मर, कितने उकस रहे हैं।
वह दुख में फँस रहे हैं, और लोग हँस रहे हैं।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

यह रुत वह है जिसमें , खुर्दो कबीर खुश हैं।
अदना गरीब मुफ्लिस, शाहो वजीर खुश हैं।
माशूक शादो खुर्रम , आशिक असीर खुश हैं।
जितने हैं अब जहाँ में, सब ऐ ‘नज़ीर’ खुश हैं।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

वर्षा ऋतु कविता - 4 - कहाँ से आये बादल काले
कहाँ से आये बादल काले?
कजरारे मतवाले!
शूल भरा जग, धूल भरा नभ,
झुलसीं देख दिशायें निष्प्रभ,
सागर में क्या सो न सके यह
करुणा के रखवाले?

आँसू का तन, विद्युत् का मन,
प्राणों में वरदानों का प्रण,
धीर पदों से छोड़ चले घर,
दुख-पाथेय सँभाले!

लाँघ क्षितिज की अन्तिम दहली,
भेंट ज्वाल की बेला पहली,
जलते पथ को स्नेह पिला
पग पग पर दीपक वाले!

गर्जन में मधु-लय भर बोले,
झंझा पर निधियाँ धर डोले,
आँसू बन उतरे तृण-कण ने
मुस्कानों में पाले!

– महादेवी वर्मा

वर्षा ऋतु कविता - 5 -रिमझिम बारिश

रिमझिम रिमझिम बारिश आई,
काली घटा फिर है छाई ।।

सड़कों पर बह उठा पानी,
कागज़ की है नाव चलानी ।।

नुन्नू-मुन्नू-चुन्नू आए,
रंग-बिरंगे छाते लाए ।।

कहीं छप-छप, कहीं टप-टप,
लगती कितनी अच्छी गपशप ।।

रिमझिम बारिश की फौहारें,
मन को भातीं खूब बौछारें ।।

बारिश की यह मस्ती है,
हो चाहे कल छुट्टी है ।।

 

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